डिंडन गेर नृत्य उत्सव – सातपुड़ा के भील समाज की गौरवशाली परंपरा
सातपुड़ा पर्वतमाला की तलहटी में बसे भील आदिवासी समाज ने अपनी सांस्कृतिक परंपराओं को आज भी जीवित रखा है। डिंडन गेर नृत्य उत्सव एक विशिष्ट, अनुशासित और सामूहिक लोकउत्सव है।
यह केवल एक नृत्य नहीं, बल्कि भील समाज की आस्था, सामाजिक एकता, अनुशासन और सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
स्थानीय परंपरा के अनुसार डिंडन गेर नृत्य की शुरुआत सन 1951-52 में कुवरसिंग तापसिंग पाडवी द्वारा इस परंपरा की शुरुआत की गई मानी जाती है। सात दशक बाद भी यह परंपरा पूरी निष्ठा से निभाई जा रही है।
उत्सव की तैयारी
होली से पहले गिमदेव पूजन किया जाता है। इस पूजन में यह तय किया जाता है कि उस वर्ष डिंडन गेर नृत्य उत्सव आयोजित किया जाएगा या नहीं तथा प्रशिक्षण कब से शुरू होगा। सभी प्रतिभागी सोजडान गाँव में एकत्रित होते हैं। सुबह 8 से 12 और शाम 4 से 6 बजे तक वर्तुळे (पुजारी) के मार्गदर्शन में प्रशिक्षण दिया जाता है। प्रशिक्षण के बाद तेज धूप में कंबल ओढ़ाकर विश्राम कराया जाता है ताकि शरीर से पसीना निकले। प्रतिभागियों की देखरेख “जुनवाली” करते हैं।
पालनी (व्रत) और अनुशासन
डिंडन गेर नृत्य में भाग लेने वाले बच्चों और युवाओं को विशेष व्रत (पालनी) का पालन करना पड़ता है:- पूर्ण स्नान नहीं कर सकते (केवल हाथ की उंगलियाँ भिगो सकते हैं)
- चप्पल या जूते पहनना वर्जित होता है
- धूप में कंबल ओढ़ना पड़ता है
- कार्यक्रम समाप्त होने तक घर नहीं जा सकते
- निर्धारित नियमों का कड़ाई से पालन करना आवश्यक है
होली से संबंध
होली के दिन प्रतिभागी अक्कलकुवा तालुका स्थित अलीविहिर बांध में स्नान करने जाते हैं। होली के दूसरे दिन सोजडान गाँव में लौटकर डिंडन गेर नृत्य उत्सव की औपचारिक शुरुआत होती है।
वेशभूषा और प्रस्तुति
डिंडन गेर नृत्य में कलाकार:- सिर पर फेटा (पगड़ी) बांधते हैं
- कमर में आकर्षक साड़ी (लुगड़ा) धारण करते हैं
- शरीर पर पारंपरिक चाँदी के आभूषण पहनते हैं
- हाथ में “डिंडन” लेकर नृत्य करते हैं/li>
मांदल, थाली और पावी की धुन पर सामूहिक नृत्य किया जाता है। इस उत्सव में भाग लेने वाले सभी कलाकार पुरुष या बालक होते हैं, लेकिन वे स्त्री वेशभूषा धारण करते हैं। स्थानीय भाषा में उन्हें“पोयरी” कहा जाता है।
सामाजिक एकता का प्रतीक
डिंडन गेर नृत्य देखने के लिए महाराष्ट्र, गुजरात और मध्यप्रदेश के लोग उत्साहपूर्वक उपस्थित होते हैं। जिस गाँव में आयोजन होता है, वहाँ के ग्रामवासी अतिथियों के लिए भोजन और निवास की व्यवस्था करते हैं।
दोपहर 1 से शाम 5 बजे तक नृत्य प्रस्तुत कर प्रकृति को नमन किया जाता है। इसके बाद दल अगले गाँव की ओर प्रस्थान करता है।
नौ प्रमुख चालें
- चालती चालो
- उभो डिंनको
- आडवो डिंनको
- होर पियो (होर = मदिरा, पियो = पीना)
- डिंनको चाटाविन माजमे उभो डिंनको टाकीन फोड़े
- डबल डिंनको गोल मोडो
- एदली चालो (देवू चालो / मोरु चालो)
- खाणको चालो
- खाडण्या चालो
डिंडन गेर नृत्य केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भील समाज की परंपरा, त्याग, अनुशासन और सामूहिकता का जीवंत प्रतीक है। बदलते समय में भी यह उत्सव अपनी मौलिकता और पहचान को सुरक्षित रखे हुए है।