लंगोट पहनने वाली आख़िरी पीढ़ी… और अंतिम संस्कार के लिए अब भी पुराने गांव का सफ़र
नर्मदा किनारे रहने वाला आदिवासी समाज, जो पीढ़ियों से प्रकृति के साथ एकरूप होकर जीवन जीता आया है, आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। लंगोट, पगड़ी और सादगीभरी जीवनशैली उनकी पहचान थी। लेकिन आधुनिकता और विस्थापन की लहर में यह संस्कृति धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। आज बुज़ुर्गों के मन में यह पीड़ा साफ़ झलकती है कि लंगोट पहनने वाली यह शायद आख़िरी पीढ़ी है।
महाराष्ट्र–गुजरात सीमा के चिमलखेड़ी क्षेत्र में, मशरूम खेती के मार्गदर्शक और आदिवासी भूषण पुरस्कार से सम्मानित राजेंद्र वसावे ने नाव के ज़रिए स्थानीय लोगों से संवाद किया। इस दौरान बाबा बुसरा वसावे ने पुनर्वास के बाद भी जारी गंभीर समस्याओं को सामने रखा।
विस्थापन के बाद भी अधूरी सुविधाएं
सरदार सरोवर बांध के कारण कई गांव जलमग्न हो गए और हजारों परिवारों को विस्थापित होना पड़ा। सरकार ने पुनर्वास तो किया, लेकिन आज भी कई गांवों में श्मशान भूमि की सुविधा नहीं है। ऐसे में किसी की मृत्यु होने पर लोगों को मृतदेह लेकर अपने पुराने गांवों में जाकर अंतिम संस्कार करना पड़ता है।
दुख के समय नदी, पहाड़ और दुर्गम रास्तों का सफर करना लोगों के लिए बेहद कष्टदायक होता है।
“हमारे पुराने गांव भले ही पानी में डूब गए हों, लेकिन हमारी भावनाएं और परंपराएं वहीं रह गई हैं। आज भी हमें अंतिम संस्कार के लिए वहीं जाना पड़ता है, क्योंकि नए गांवों में श्मशान तक नहीं है।”
मूलभूत सुविधाओं का अभाव
आज भी कई पुनर्वसित गांवों में सड़क, साफ़ पानी, स्वास्थ्य सेवाएं और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। विकास के नाम पर विस्थापन तो हुआ, लेकिन सम्मान से जीने के लिए जरूरी सुविधाएं अब भी अधूरी हैं — ऐसा लोगों का दर्द है।
युवाओं के लिए संदेश
बाबा बुसरा वसावे ने युवाओं को संदेश देते हुए कहा —
“हमारे समय में शिक्षा नहीं थी, लेकिन आज की पीढ़ी को पढ़-लिखकर समाज के लिए काम करना चाहिए। बिना भ्रष्टाचार के अपने गांव और संस्कृति को बचाना होगा।”
संस्कृति और अस्तित्व की लड़ाई
नर्मदा किनारे की यह लड़ाई सिर्फ जमीन की नहीं है, बल्कि संस्कृति, परंपरा और अस्तित्व को बचाने की लड़ाई है।
लंगोट पहनकर समाज को दिशा देने वाली पीढ़ी अब समाप्त होती जा रही है…
और पुनर्वास के बाद भी मृतकों को सम्मानपूर्वक विदाई देने के लिए गांव-गांव में संघर्ष जारी है।
